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डिप्रेशन - लक्षण, निदान, उपचार और स्वयं-सहायता

DocFinder, Shutterstock
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 35 करोड़ से अधिक लोग डिप्रेशन के शिकार हैं। ऑस्ट्रिया में, लगभग 10-25% लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार डिप्रेशन का अनुभव करते हैं। सटीक आंकड़े पाना कठिन है – डिप्रेशन के सभी मामलों की पहचान और उपचार डिप्रेशन के रूप में नहीं किया जाता। डिप्रेशन के संकेतों और लक्षणों, डिप्रेशन और उदासी के मध्य अंतर, और वर्तमान समय में डिप्रेशन का उपचार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधियों के बारे में जानने के लिए पढ़ना जारी रखें।

डिप्रेशन के लक्षण

मनोरोग विज्ञान में, डिप्रेशन को एक अफ़ेक्टिव डिसऑर्डर (affective disorder) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। कभी-कभार मूड डिसऑर्डर कहे जाने वाले, अफ़ेक्टिव डिसऑर्डर मनोविकारों का समूह होते हैं जिनकी विशेषता, अन्य पहलुओं के अलावा, चिकित्सकीय रूप से उल्लेखनीय मूड में परिवर्तन होती है। डिप्रेशन एक मानसिक बीमारी होती है जिसका संबंध, प्रेरणा में कमी, रुचि और आनंद में कमी, आनंद की सीमित अनुभूति और सामान्य रूप से ऊर्जा में कमी से होता है। जो लोग डिप्रेशन से पीड़ित नहीं हैं, उनकी तुलना में डिप्रेशन से पीड़ित लोग इन लक्षणों को अधिक गंभीरता से और अधिक लंबी अवधियों के लिए अनुभव करते हैं। उन्हें उन लोगों की तुलना में स्वयं को प्रेरित करने में भी कठिनाई होती है, जिन्हें डिप्रेशन नहीं होता। और तो और, डिप्रेशन को कई शारीरिक समस्याओं से जोड़ा जा सकता है, जैसे सरदर्द, पीठ में दर्द, कब्ज, परिसंचरण तंत्र से संबंधित विकार और छाती में जकड़न का अहसास। डिप्रेशन से ग्रसित लोगों को कभी-कभार लगता है कि उन्हें उन गतिविधियों में कोई आनंद नहीं आता जिनमें अन्यथा उन्हें आनंद या उनकी भूख में, और परिणामस्वरूप, उनके वजन में बदलाव देखने को मिलता है।

डिप्रेशन के कारण

डिप्रेशन के संभावित कारण उतने ही विविध हैं जितने कि वे लक्षण जिनका अनुभव इस स्थिति से ग्रसित लोग करते हैं।

जीवन में सभी प्रकार की परिस्थितियाँ डिप्रेशन को उत्पन्न कर सकती हैं, जिनमें निम्नलिखित भी शामिल हैं: कार्यस्थल पर या घर पर दीर्घकालीन या लंबे समय से चलने वाले विवाद लंबे समय का तनाव या थकान
गंभीर शारीरिक स्थितियां नुकसान का अनुभव, जैसे ब्रेक-अप, तलाक या प्रियजन की मौत घर बदलना और जगह से जुड़ा हुआ नहीं महसूस करना किसी चीज़ से दूर भागना नौकरी गंवाना बचपन की दर्दनाक घटनाएँ (जैसे शारीरिक और/या यौन शोषण_

शारीरिक अवस्थाओं की वजह से भी डिप्रेशन हो सकता है। ऐसे मामलों को ऑर्गेनिक डिप्रेशन कहा जाता है। उदाहरण के लिए, हाइपोथाइरायडिज़्म – जिसमें व्यक्ति के थाइराइड हार्मोन के स्तर सामान्य से नीचे होते हैं – एक डिप्रेशन जैसी अवस्था में ले जा सकता है। एक अन्य उदाहरण के तौर पर, फ्रंटल लोब में ट्यूमर मष्तिष्क में सामने की ओर की संरचनाओं में दबाव डाल सकता है जो व्यक्ति के मूड को नियंत्रित करने का काम करती हैं। हालाँकि डिप्रेशन के कारणों और इसे सक्रिय करने वाले कारकों पर शोध आज भी जारी है, हमें पता है कि एक डिप्रेशन-ग्रस्त व्यक्ति के मष्तिष्क की गतिविधि ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न होती है जो डिप्रेशन से पीड़ित नहीं है। डिप्रेशन मष्तिष्क के कुछ विशिष्ट हिस्सों में तंत्रिका कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को भी परिवर्तित कर सकता है और सेरोटोनिन (serotonin) और नोराड्रेनालाइन (noradrenaline) न्यूरोट्रांसमिटरों की गतिविधि में परिवर्तन भी कर सकता है। न्यूरोट्रांसमिटरों को मष्तिष्क के कैरियर सब्सटेंस भी कहते हैं और वे तंत्रिका कोशिकाओं के मध्य सूचना के आदान-प्रदान का कार्य करते हैं। आसान शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति डिप्रेशन से पीड़ित है, तो उनके मष्तिष्क में संकेतों का वहन करने वाले पदार्थ संतुलन में नहीं होते। इसके अलावा, एक व्यक्ति को डिप्रेशन का खतरा अधिक होता है यदि कोई सगा संबंधी भी डिप्रेशन से पीड़ित है या अतीत में हो चुका है।

डिप्रेशन और लो मूड में अंतर

कार्यस्थल पर विवादों, संबंध में तनाव, ब्रेक-अप, झगड़ों, वित्तीय कठिनाइयों, एक दुर्घटना या प्रियजन की क्षति की वजह से कोई भी मायूस महसूस कर सकता है। थकान, अंदरुनी चिंता, दुःख, उदासी और नीरस महसूस करना पूरी तरह सामान्य है: हर कोई इन भावनाओं को महसूस करता है, कुछ लोग इन्हें दूसरों की अपेक्षा अधिक महसूस करते हैं। हालाँकि, चिकित्सकीय दृष्टिकोण से लो मूड को डिप्रेशन से भिन्न माना जाता है और यह अक्सर एक मुश्किल भरी घटना और/या जीवन में एक तनावभरी अवस्था से संबंधित होता है। एक बार जब तनाव और दर्द कम हो जाता है, व्यक्ति के मूड में भी सुधार होता है।

Definition of depression

ICD-10 (बीमारियों और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं केअंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकीय वर्गीकरण का 10वाँ संस्करण, डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी) के अनुसार डिप्रेशन की अवस्था मानदंड तब पूरा होता है यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो लक्षणों को कम से कम दो सप्ताह के लिए महसूस करता है:

  • इस हद तक लो मूड जो संबंधित व्यक्ति के लिए असामान्य है, जो दिन में ज़्यादातर समय, लगभग हर दिन रहता है, और आम तौर पर परिस्थितियों के प्रति भावशून्य रहता है
  • उन गतिविधियों में रुचि या आनंद में कमी जो सामान्य तौर पर आनंददायक होतीं
  • ऊर्जा में कमी और थोड़े से प्रयास के बाद काफी थकान

इसके अतिरिक्त, व्यक्ति में निम्नलिखित में से कम से कम एक लक्षण दिखाना चाहिए।

  • आत्मविश्वास और स्वाभिमान की भावना में कमी
  • अकारण खुद को दोष देने के अहसास होना या स्पष्ट रूप से और अकारण ग्लानि होना
  • बार-बार मौत या आत्महत्या के ख्याल आना
  • सोचने या ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होना, हिचकिचाहट या निर्णय लेने में दुविधा होना
  • असामान्य रूप से मानसिक उद्वेलित होना (चंचलता) या मंदता
  • सभी प्रकार की नींद की गड़बड़ियाँ
  • भूख का घटना – या भूख का बढ़ना – और तदनुसार वजन में परिवर्तन

ज्यादातर लोग को लो मूड और डिप्रेशन की अवस्था के मध्य अंतर को स्पष्ट नहीं मानते। हालाँकि, एक अनुभवी डॉक्टर अंतर बता सकता है।

डिप्रेशन का वर्गीकरण और स्वरूप

डिप्रेशन को गंभीरता के तीन स्तरों में वर्गीकृत किया जाता है:

  • मामूली डिप्रेशन: कुल मिलाकर, व्यक्ति ऊपर सूचीबद्ध लक्षणों में से कम से कम तीन लक्षण दर्शाता है, जिनमें से दो पहली श्रेणी (लो मूड, रुचि और आनंद में कमी, ऊर्जा में कमी) से होते हैं। मरीज अस्वस्थ महसूस करता है और चिकित्सकीय सहायता लेता है, हालँकि वे अपनी परेशानी के बावजूद ज्यादातर पेशेवर और व्यक्तिगत गतिविधियाँ जारी रखने में समर्थ होते हैं – बशर्ते कि ये कार्य दिनचर्या का हिस्सा हों।
  • मध्यम डिप्रेशन: कुल मिलाकर, व्यक्ति ऊपर सूचीबद्ध लक्षणों में से कम से कम छह लक्षण दर्शाता है, जिनमें से दो पहली श्रेणी से होते हैं। वह पेशेवर और व्यक्तिगत कार्य कर पाने में अक्षम हो जाता है, और कभी-कभार ही कर पाता है।
  • गंभीर डिप्रेशन: कुल मिलाकर, व्यक्ति ऊपर सूचीबद्ध लक्षणों में से कम से कम आठ लक्षण दर्शाता है, जिनमें पहली श्रेणी के तीनों लक्षण शामिल होते हैं। मानसिक लक्षणों के बिना एक गंभीर डिप्रेशन की अवस्था से जूझ रहे व्यक्ति को सतत देखभाल और समर्थन की आवश्यकता होती है। मानसिक लक्षणों वाली डिप्रेशन की अवस्था में पागलपन के विचार, ग्लानि की निरर्थक भावनाएँ और/या बीमार होने के डर की भावनाएँ शामिल हो सकती हैं।

डिप्रेशन के विभिन्न प्रकारों के मध्य भी अंतर किया जाता है। गंभीरता, कारणों और सामने आने वाले लक्षणों के आधार पर, डिप्रेशन को निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जाता है:

  • यूनीपोलर डिप्रेशन: डिप्रेशन का सबसे आम प्रकार यूनीपोलर डिप्रेशन होता है। यह बहुत धीरे-धीरे विकसित होता है; प्रभावित हुए व्यक्ति में लक्षण कुछ दिनों, सप्ताह या यहाँ तक कि महीनों के बाद दिखना शुरू होते हैं। बहुत से मामलों में, ये लक्षण अपने आप गायब हो जाते हैं।
  • बाइपोलर डिप्रेशन: नीरस (डिप्रेसिव) मूड और अत्यधिक उत्साह के बीच अदला-बदली।
  • प्रसवोत्तर डिप्रेशन: प्रसवोत्तर डिप्रेशन की परिभाषा कहती है कि यह एक व्यक्ति में जन्म देने और उनके बच्चे के पहले जन्मदिन के बीच होता है। जो महिलाएँ पहले किसी प्रकार के डिप्रेशन से पीड़ित हो चुकी हैं, उनमें प्रसवोत्तर डिप्रेशन से प्रभावित होने का जोखिम अधिक होता है।
  • सीज़नल अफ़ेक्टेड डिसऑर्डर: सीज़नल अफ़ेक्टेड डिसऑर्डर (एसएडी) डिप्रेशन का एक कम प्रचलित स्वरूप है। जैसा कि नाम से पता चलता है, यह किसी विशेष ऋतु की वजह से उत्पन्न होता है (जैसे, शीतकालीन डिप्रेशन)

स्थिति की प्रगति और आजमाई गई थेरेपी की सफलता के आधार पर, डिप्रेशन को आगे भी वर्गीकृत किया जा सकता है – डिप्रेसिव एपिसोड (जो केवल एक बार या कुछ बार हो सकता है) या क्रोनिक डिप्रेशन (जब लक्षण दो साल से अधिक समय तक बने रहते हैं)। जब एक व्यक्ति पूरी तरह से स्वास्थ्य लाभ कर लेता है, तो इसे रेमिशन के नाम से जाना जाता है। यदि ‏व्यक्ति के लक्षणों में उल्लेखनीय ढंग से कमी आती है लेकिन ये पूरी तरह से गायब नहीं होते, तो इसे अधूरे रेमिशन के नाम से जाना जाता है।

शीतकालीन डिप्रेशन

शीतकालीन डिप्रेशन साल के ठंडे, कम प्रकाश वाले हिस्से के दौरान होता है। यह पुरुषों की तुलना में चार गुना अधिक महिलाओं को प्रभावित करता है और यह स्कैंडिनेवियाई और मध्य-यूरोपीय देशों में विशेष रूप से आम है। दक्षिणी देशों में शीतकालीन डिप्रेशन विरले ही देखने को मिलता है। शीतकालीन डिप्रेशन के कारणों में सर्दियों के महीनों प्राकृतिक रोशनी की कमी और प्रकाश की घटी हुई तीव्रता, और कम तापमान शामिल हैं। शरीर सूर्य की रोशनी में कमी के प्रतिक्रियास्वरूप मेलाटोनिन (melatonin) को अधिक मात्रा में स्रावित करने लगता है, एक हार्मोन जो हमारी नींद के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इसके परिणामस्वरूप हम जल्दी थकने लगते हैं और हमारे मूड की हालत खराब होने लगती है। विंटर डिप्रेशन के सामान्य लक्षणों में नींद की ज़्यादा आवश्यकता महसूस होने लगना, सुबह थकान होना, प्रेरणा और ऊर्जा की कमी, असंतुलन की भावना और बुझा हुआ मूड शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, विंटर डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति में सेरोटोनिन की कमी हो जाती है (एक हार्मोन जो हमारी नींद के पैटर्न, शरीर के तापमान, कामेच्छा और भावनात्मक अवस्था को नियंत्रित करता है) जिसका अर्थ है कि इस स्थिति से जूझने वाले लोगों में मीठी चीजें खाने की लालसा बढ़ जाती है, क्योंकि शर्करा मष्तिष्क को सेरोटोनिन के असंतुलन की पूर्ति करने में मदद करती है।

डिप्रेशन का निदान

बहुत से लोग अकारण शर्मिंदगी की भावना के चलते अपने डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं या अपने लक्षणों को छिपाते हैं। हालाँकि, एक डॉक्टर के साथ परामर्श करने से व्यक्ति के मूड में परिवर्तनों के संभावित कारणों की पहचान करने में मदद मिल सकती है – और एक उचित पद्धति से उपचार शुरू किया जा सकता है। मुख्य रूप से मरीज और डॉक्टर के मध्य गहराई से परामर्श के बाद, या तो एक प्रशिक्षित डॉक्टर या एक मनोरोग विशेषज्ञ डिप्रेशन का निदान करेगा। कुछ मामलों में विश्लेषण के लिए खून की जाँच की जा सकती है और कंप्यूटर टोमोग्राफ़ी (सीटी) स्कैन किया जा सकता है। इसका उद्देश्य डिप्रेशन के कारण की पहचान करना और किसी शारीरिक परिवर्तन, जैसे विटामिन B12 की कमी, हॉर्मोन के स्तर में परिवर्तन या लो ब्लड शुगर स्तर की संभावना को बाहर करना होता है।

डिप्रेशन का उपचार

डॉक्टर और मरीज के मध्य परामर्श और जाँचों और स्कैन के परिणामों के आधार पर, डॉक्टर एक उचित उपचार योजना तैयार कर सकता है। डिप्रेशन का उपचार दवाओं या साइकोथेरेपी, दोनों के माध्यम से किया जा सकता है। बहुत से मामलों, दोनों का मिश्रण विशेष रूप से असरदार सिद्ध होता है। याद रखने के लिए यह बात महत्त्वपूर्ण है कि कोई भी थेरेपी समय लेगी: सर्वश्रेष्ठ उपचार योजना के साथ भी, डिप्रेशन रात भर में गायब नहीं होगा।

एंटीडिप्रेसेंट

डिप्रेशन का उपचार करने के लिए मरीज को लिखी जाने वाली दवाओं को एंटीडिप्रेसेंट कहा जाता है। ये एंटीडिप्रेसेंट मरीज के मष्तिष्क में विभिन्न न्यूरोट्रांसमिटर तंत्रों में हस्तक्षेप करके और न्यूरोट्रांसमिटर असंतुलन की पूर्ति करके काम करते हैं। आज कल विभिन्न प्रकार के एंटीडिप्रेसेंट उपलब्ध हैं: आधुनिक दवाएँ अतीत में इस्तेमाल किए जाने वाले एंटीडिप्रेसेंट (जैसे ट्राइसाइक्लिक और टेट्रासाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट) की तुलना में अधिक लक्षित होती हैं और इनके साइड-इफ़ेक्ट भी अपेक्षाकृत कम होते हैं। आज के समय में, डिप्रेशन के उपचार के लिए मरीजों को सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली दवाओं में ये शामिल हैं: सेलेक्टिव सेरोटोनिन री-अपटेक इनहिबिटर (या एसएसआरआई, जो उन अणुओं को बाधित करते हैं जो सेरोटोनिन के पुनः-अवशोषण के लिए जिम्मेदार होते हैं); सेरोटोनिन–नॉर-एपिनेफ्रीन री-अपटेक इनहिबिटर (या एसएनआरआई, जो मष्तिष्क में नॉर-एपिनेफ्रीन और सेरोटोनिन का पुनः-अवशोषण रोकते हैं) और नॉर-एपिनेफ्रीन–डोपामाइन री-एपटेक इनहिबिटर (या एनडीआरआई, जो मष्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा नॉर-एपिनेफ्रीन और डोपामाइन की पुनः प्राप्ति को रोकते हैं)। आधुनिक एंटीडिप्रेसेंट के सक्रिय पदार्थों में साइटेलोप्राम, एसाइटेलोप्राम, फ्लुओक्सेटिन, फ़्लूवॉक्समिन, परोक्सेटीन, सर्ट्रालीन, डुलॉक्सेटीन, मिल्नासीप्रन, वेल्नाफ़ैक्सीन, बूप्रोपियोन और रीबॉक्सिटीन शामिल हैं। मरीज को लिखे गए एंटीडिप्रेसेंट के आधार पर, उसका मूड सुधरने में औसतन आठ दिन से तीन सप्ताह तक लग सकते हैं। यदि दवा से इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं होता है, तो डिप्रेशन के इलाज के लिए डॉक्टर मरीज की खुराक में परिवर्तन कर सकत है या कोई दूसरा एंटीडिप्रेसेंट लिख सकता है।

साइकोथेरेपी

जहाँ दवाएँ व्यक्ति के मष्तिष्क में न्यूरोट्रांसमिटर के मध्य संतुलन को फिर से बहाल करने में सहायता कर सकती हैं, वे एक व्यक्ति की जीवन परिस्थिति को बेहतर नहीं बना सकतीं और मूल कारण से नहीं निपट सकतीं। साइकोथेरेपी में, डिप्रेशन से पीड़ित लोग सीख सकते हैं कि (आंतरिक) द्वन्द्व और भावनाओं से अधिक असरदार तरीके से कैसे निपटें, ब्रेक-अप आदि से अधिक स्वस्थ ढंग से कैसे निपटें और लोगों के साथ विवादों को कैसे हल करें। यदि व्यक्ति के लो मूड का कारण अज्ञात होता है, तो एक साइकोथेरेपिस्ट के साथ सत्रों से अंतर्निहित मुद्दों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है। थेरेपी के कई अलग-अलग प्रकार होते हैं। उदाहरण के लिए, साइकोडायनमिक थेरेपी का उपयोग थेरेपिस्ट के साथ एक क्रमागत प्रक्रिया में गहरी दबी समस्याओं – जिनकी जड़ें एक व्यक्ति के बचपन हो सकती हैं – पर काम करने के लिए किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, बिहैवरल थेरेपी में साइकोथेरेपिस्ट अपने मरीज की की नई व्यवहारगत रणनीतियाँ विकसित करने और नकारात्मक व्यवहारों और विचारों के पैटर्न से दूर जाने में सहायता करता है। थेरेपी की सफलता के लिए, साइकोथेरेपिस्ट और मरीज के मध्य एक अच्छा संबंध विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण होता है। एक ईमानदारी, भरोसेमंद संबंध का विकास अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है ताकि थेरेपी के दौरान दोनों पक्ष बिना किसी हिचकिचाहट सभी समस्याओं और मुद्दों पर पर के चर्चा कर सकें। दवाओं और साइकोथेरेपी के अतिरिक्त, अन्य संभावित उपचार भी हैं; इनमें मैग्नेटिक स्टिमुलेशन, काइनेसिथेरेपी (या मूवमेंट थेरेपी), इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी और लाइट थेरेपी। लाइट थेरेपी का उपयोग मुख्य रूप से शीतकालीन डिप्रेशन का उपचार करने के लिए किया जाता है। लाइट थेरेपी में, मरीज छह से आठ लैंप वाले एक प्रकाश उपकरण के सामने बैठता है जिससे फ़्लोरोसेंट प्रकाश निकलता है (हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों के बिना)। उत्सर्जित प्रकाश की तीव्रता एक साफ बादलों वाले दिन सूर्य के प्रकाश के समान होती है और मष्तिष्क की विशिष्ट संरचनाओं पर एक सकारात्मक प्रभाव डालती है। लाइट थेरेपी की अनुशंसित अवधि आधे घंटे से लेकर चार घंटे तक होती है। इस तरह के उपचार शुरू करने से पहले, आपको इनकी चर्चा सदैव एक डॉक्टर से करनी चाहिए।

स्वयं-सहायता जो डिप्रेशन का उपचार कर सकती है

  • व्यायाम: खेलकूद और/या ताज़ी हवा में टहलने से व्यक्ति के मूड पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव होता है।
  • पोषण: एक स्वस्थ, संतुलित आहार लेना न केवल शरीर के लिए अच्छा होता है, बल्कि इससे व्यक्ति की मानसिक अवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • लोगों से मिलना-जुलना: खुद को अलग-थलग करने की अपेक्षा एक सक्रिय सामाजिक जीवन के लिए प्रयास करना और परिवार तथा दोस्तों के साथ समय बिताना एक सकारात्मक कदम होता है।
  • नई चीज़ें आजमाएँ: अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करने के ढेरों तरीके हैं, जैसे योग, सॉना और अन्य स्वास्थ्यकर प्रोग्राम जो विश्राम को प्रोत्साहित करते हैं और तनाव घटाने में सहायता करते हैं।
  • सतत बने रहना: यह महत्त्वपूर्ण है कि एक मरीज मूड में सुधार होते ही एंटीडिप्रेसेंट लेना बंद नहीं करे। थेरेपी की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करने के लिए डॉक्टर से नियमित मुलाकातें और थेरेपी सत्र महत्त्वपूर्ण होते हैं।

स्रोत
Dr Brigitte Schmid-Siegel, Division of Social Psychiatry, Department of Psychiatry and Psychotherapy, Medical University of Vienna; Die postpartale Depression, Spectrum Psychiatrie 03/2015, MedMedia Verlag und Mediaservice GmbH [in German]

Dr Hans-Peter Kapfhammer, Department of Psychiatry, Medical University of Graz; “Organische Depression” versus komorbide Depression bei somatischen Krankheiten, neuro Supplementum 03/2015, Austrian Neurology Society [in German]

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Dr Siegfried Kasper, Department of Psychiatry and Psychotherapy, Medical University of Vienna; Unipolare Depression, Clinicum Neuropsy 05/2011, Medizin Medien Austria GmbH [in German]


Autor: Katharina Miedzinska, MSc